यह अंश भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक 'अँधेर नगरी' का संक्षिप्त भाग है, जो एक महंत, उनके शिष्यों और एक मूर्ख राजा की कहानी प्रस्तुत करता है।
पहले दृश्य में, शिष्य गोबर्धनदास एक ऐसे शहर 'अँधेर नगरी' की खोज करता है जहाँ हर वस्तु, चाहे वह सब्जी हो या मिठाई, 'टके सेर' मिलती है। महंत इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था के कारण शहर में रहने से इनकार कर देते हैं, लेकिन गोबर्धनदास सस्ते भोजन के लालच में वहीं रुक जाता है।
दूसरे दृश्य में, एक दीवार गिरने से बकरी मरने पर, राजा 'चौपट राजा' न्याय की एक लंबी और बेतुकी प्रक्रिया शुरू करता है, जिसमें दोष कारीगर, चूनेवाले, भिश्ती, कसाई और गड़रिये से होते हुए अंततः कोतवाल पर आता है, जिसे फाँसी की सज़ा सुनाई जाती है।
अंतिम दृश्य में, कोतवाल के पतले होने के कारण फंदा बड़ा निकलता है, और इसलिए राजा के आदेश पर, सबसे मोटे व्यक्ति गोबर्धनदास को निर्दोष होते हुए भी फाँसी देने की तैयारी होती है, लेकिन महंत वापस आकर यह कहकर अपने शिष्य को बचा लेते हैं कि उस शुभ मुहूर्त में फाँसी चढ़ने वाला सीधा स्वर्ग जाएगा, जिसके कारण स्वयं राजा लालच में आकर फाँसी चढ़ जाता है।
अंधेर नगरी' का अर्थ है ऐसा स्थान या राज्य जहाँ नियम, न्याय और व्यवस्था का अभाव हो और भ्रष्टाचार, अन्याय तथा अव्यवस्था फैली हो। यहाँ शासक या अधिकारी अयोग्य, भ्रष्ट और मूर्ख होते हैं, जिसके कारण समाज में अराजकता, भ्रष्ट व्यवस्था और कानून का पालन नहीं होता है.
विस्तार से अर्थ
यह एक मुहावरा है जो एक ऐसे स्थान, शहर या राज्य के लिए प्रयोग होता है जहाँ नेताओं या शासकों की लापरवाही, मूर्खता और भ्रष्टाचार के चलते सभी ओर अव्यवस्था, लूट, अत्याचार तथा 'जो जैसा चाहें करे' वाली स्थिति हो जाती है.
इसका उपयोग आम भाषा में भी होता है, जब किसी व्यवस्था या स्थान की स्थिति अराजक, असंगठित और अनियंत्रित हो.
उदाहरण
"राम के घर के आस-पास अंधेर नगरी फैली हुई है।"
"अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा"— यह पंक्ति बताती है कि जब शासन व्यवस्था भ्रष्ट और लापरवाह हो, तो चीजों की कोई कीमत या महत्व नहीं बचता.
साहित्यिक संदर्भ
'अंधेर नगरी' नाटक प्रसिद्ध लेखक भारतेन्दु हरिश्चंद्र द्वारा रचित है, जिसमें भ्रष्ट शासन, अधिकारियों की रिश्वतखोरी, सामाजिक और धार्मिक शोषण का चित्रण किया गया है.
इस प्रकार, अंधेर नगरी का अर्थ है अराजकता, अव्यवस्था और अन्याय से भरा राज्य या स्थान।
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